Kuchh rakha hua sa…

July 30, 2010 at 12:29 am | Posted in fun, india, knowledge, poem | 2 Comments
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वो कटी फटी पत्तियां और दाग हल्का हरा हरा

रखा हुआ था किताब में मुझे याद है वो ज़रा ज़रा|

तनहा रहना फितरत में नहीं तनहा रहना मजबूरी है

तन्हाई तो बस काली हैं तेरी याद मगर सिंदूरी है |

इन रंग बिरंगी यादों में कुछ और भी रंग है भरा भरा,

रखा हुआ था किताब में मुझे याद है वो ज़रा ज़रा|

एक झलक तेरी लेने के लिए जो उठते थे हम सुबह तडके

बस खून सा दिल में होता था जब मिलते थे तुझसे वो लड़के |

पायल की छम छम याद है अब भी याद है तेरा वो गजरा

रखा हुआ था किताब में मुझे याद है वो ज़रा ज़रा|

2 Comments »

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  1. गुलज़ार साब की निम्नलिखित पंक्तियाँ पढ़ी थीं।

    [वो कटी फटी हुई पत्तियां, और दाग़ हल्का हरा हरा!
    वो रखा हुआ था किताब में, मुझे याद है वो ज़रा ज़रा|

    मुझे शौक़ था के मिलूं तुझे, मुझे खौफ़ भी था कहूंगा क्या!
    तेरे सामने से निकल गया, बडा सहमा सहमा डरा डरा|

    बडा दोगला है ये शख्स भी, कोइ ऐतबार करे तो क्या
    ना तो झूठ बोले कवि कभी, ना कभी कहे वो खरा खरा|]
    ………………………………………………………………………………………

    अगर आपकी कविता की पहली दो पंक्तिया गुलजार साब की
    कविता से हूबहू न मिलतीं तो
    आपकी कविता का मह्त्व ज्यादा बढ़ जाता

  2. HI THIS IS THE BEST


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