मज़ा लिया जाए – Ghazal

December 12, 2012 at 11:42 am | Posted in india | Leave a comment
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दिन है इतवार का मज़ा लिया जाए
थोडा इंतज़ार का मज़ा लिया जाए

जवानी का पतझड़ कब का गुज़र गया गया
बुढापे  की बहार बहार का मज़ा लिया जाए

कलम दवात मेरी पूरी ज़िन्दगी को खा गए
खंजरों की धार का मज़ा लिया जाए

बेईमान हो गए तो उनकी हैसियत बदल गई
फिर से इमानदार का मज़ा लिया जाए

पहली नज़र में ही उसे दिल दिया मैंने
मोहब्बत की इस हार का मज़ा लिया जाए

कभी कभी बच्चे भी बनके देख लो यारों
माँ के उस दुलार का मज़ा लिया जाए

घटनाएं रोज़ ही होती रहेंगी नया कुछ नहीं है
चलो पुराने अखबार का मज़ा लिया जाए

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Hindi ki Kahaani

September 14, 2012 at 12:48 pm | Posted in india | Leave a comment
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युग बदल गया अब वो हिंदी न रही
सलवार की जगह जींस आ गयी, और माथे पे बिंदी न रही |

कल तक जो दुपट्टा था आज वो stole हो गया
अरे हिंदी का आसन बुरी तरह से डांवाडोल हो गया |

हिंदी बोलने में आजकल के संस्कारी युवा झिझकते हैं, शर्माते हैं
अधकचरा अंग्रेजी बोल कर अपने जैसे ही लोगों में upclass कहलाते हैं |

हिंदी की इज्ज़त सिर्फ सितम्बर के राजभाषा मास में होती है
बाकी के महीने ये किसी कोने में दुबक कर सोती है |

अगर आगे बढ़ना है तो हमें इसे ऊपर उठाना होगा
हिंदी की आग को हम सबके अन्दर भड़काना होगा
वरना मेरे दोस्त, अधकचरी भाषाओँ में हम कहीं खो जायेंगे
जिन संस्कारों को दुनिया मानती है उनमे भी  हम अधकचरे हो जायेंगे |

Insaaf ki Dagar Pe

September 28, 2010 at 9:49 pm | Posted in india | Leave a comment
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इन्साफ की डगर पे नेता की तरह चल के
भारत को चूस मारो स्ट्रा बदल बदल के

पुलिस है इनकी मौसी और ये पुलिस के मामा
दोनों हैं मिलके करते जनता का पंचनामा
कभी खाएं हमें कच्चा कभी खाएं हमें तल के
भारत को चूस मारो स्ट्रा बदल बदल के

पार्टी कोई भी आये पार्टी कोई भी जाए
बस ख्वाब दिखा कर वो पब्लिक के मन को भाये
धुन तो है वही बजती बस हारमोनियम बदलते
भारत को चूस मारो स्ट्रा बदल बदल के

A poem for all the Team Leaders and Managers

May 30, 2010 at 2:58 pm | Posted in fun, india, knowledge, poem | Leave a comment
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Please rate and comment on my new poem.

अंगुली उठा कर इशारा किया
टॉयलेट जाने का सहारा लिया |

टास्क की पोजीशन पता ही न थी,
प्रोजेक्ट की तो बड़ी बात थी
अकेला नहीं था मैं इस बात पर
मेरी मेनेजर भी मेरे साथ थी|
‘सॉरी’ कहकर किनारा किया,
टॉयलेट जाने का सहारा लिया|

के नीचे से गाली के ऊपर से गाली,
बड़ी गन्दी गन्दी बड़ी काली काली,
प्रमोशन नहीं दो तो पैसा तो दो
कम से कम दूसरी कंपनी जैसा तो दो|
के कितनो को हमने बेचारा किया
टॉयलेट जाने का सहारा लिया|


ऐ ज़िन्दगी – Ae Zindagi

May 7, 2010 at 7:16 pm | Posted in india, poem | 1 Comment
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ऐ ज़िन्दगी

कभी कटती है कभी कटती ही नहीं,

ज़िन्दगी से मेरी पटती ही नहीं |

हर किसी के लिए खुलती सी जाती है,

सिर्फ अपने लिए सिमटती ही नहीं |

रोज़ कितनी बार मुझको मार देती है

कभी मेरे हाथों पिटती ही नहीं |

दिन रात इसकी बोली मैं घोंटता रहता हूँ

कभी मेरी बोली ये रटती ही नहीं |

जो जानता नहीं उसे ये मिल नहीं पाती

जीने वालों के लिए कभी घटती ही नहीं |

मेरे टीचर कहते हैं

January 22, 2010 at 2:07 pm | Posted in humour, india | 6 Comments
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I wrote this poem today. Please rate it and comment on how you feel about the same.

जिस देश में गंगा बहती है
उस  देश  में  नंगे  रहते  हैं
ये  मेरे शब्द  नहीं  हैं
ऐसा  मेरे  टीचर कहते हैं

खम्बे हैं  पर  बत्ती  गुल
महीने  की  इनकम 6 सौ  कुल
दीवाली में  दिल  जलता  है
पर  हंस  कर  ये  सब  सहते  हैं

ये  मेरे शब्द  नहीं  हैं
ऐसा  मेरे  टीचर कहते हैं

अँगरेज़  यहाँ  से  चले  गए
अंग्रेजी  माता  छोड़  गए
इस  देश  की  सुन्दर  भाषा  का
हर  अंग  पटक  कर  तोड़  गए

इस  क्षति  को  देख  के  रोता  हूँ
और  खून  के  आंसू  बहते  हैं

ये  मेरे  शब्द  नहीं  हैं
ऐसा  मेरे  टीचर  कहते  हैं

—— हिमांशु जोशी


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