Hindi ki Kahaani

September 14, 2012 at 12:48 pm | Posted in india | Leave a comment
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युग बदल गया अब वो हिंदी न रही
सलवार की जगह जींस आ गयी, और माथे पे बिंदी न रही |

कल तक जो दुपट्टा था आज वो stole हो गया
अरे हिंदी का आसन बुरी तरह से डांवाडोल हो गया |

हिंदी बोलने में आजकल के संस्कारी युवा झिझकते हैं, शर्माते हैं
अधकचरा अंग्रेजी बोल कर अपने जैसे ही लोगों में upclass कहलाते हैं |

हिंदी की इज्ज़त सिर्फ सितम्बर के राजभाषा मास में होती है
बाकी के महीने ये किसी कोने में दुबक कर सोती है |

अगर आगे बढ़ना है तो हमें इसे ऊपर उठाना होगा
हिंदी की आग को हम सबके अन्दर भड़काना होगा
वरना मेरे दोस्त, अधकचरी भाषाओँ में हम कहीं खो जायेंगे
जिन संस्कारों को दुनिया मानती है उनमे भी  हम अधकचरे हो जायेंगे |

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